
Veralayam.com
सम्यग् दृष्टि
- श्रद्धालु की पहचान -
सम्यग् दृष्टि - श्रद्धालु की पहचान -
ग्रन्थी भेद के बाद सम्यग् दर्शन होने के बाद स्वयं की पहचान कैसी बनाएं ? हम सम्यक्त्वी है या नहीं ? आपके वचन व्यवहार, आपका काय योग का व्यापार एवं आपके संस्कार से पता चल सकता है कि आपको सम्यग् दर्शन हुआ है या नहीं ? सम्यक्त्व एक रत्न है उसकी रक्षा करने हेतु संरक्षक दिवाल के रूप में 67 बोल का वर्णन ----जब मिथ्यात्वी जीव की पहचान हो सकती है तो फिर सम्यग् दृष्टि की पहचान क्यों नहीं हो सकती है ?
4 सद्दहणा, 3 लिंग, 10 विनय, 3 शुद्धि, 5 दूषण, 8 प्रभाव, 5 भूषण, 5 लक्षण, 6 जयणा, 6 आगार, 6 भावना, 6 स्थान 4+3+10+3+5+8+5+5+6+6+6+6 = 67
4 सद्दहणा -
1) परमार्थ संस्तव - जीवादि तत्त्व का बहुमान पूर्वक यथार्थ बोध - अभ्यास करना ।
2) परमार्थ ज्ञातृ सेवन - तत्त्वज्ञाता आचार्य भगवंतादि की सेवा करना,
3) व्यापन्नवर्जन - जैन दर्शन से भ्रष्ट और साधुवेषधारी निन्हवादि के संसर्ग का त्याग करना,उनको गुरू रूप मानना नहीं ।
4) कुदृष्टि वर्जन - बौद्धादि अन्य दर्शनी के संसर्ग का त्याग । ऐसे गुण वाले जीव में सम्यक्त्व है ऐसी श्रद्धा हो सकती है अतः इनको चार सद्दहणा कहते हैं । प्रसंग - अंगारमर्दकाचार्य आदि अभव्योमें भी जीवादि तत्त्व का बोध सद्दहणा होते हुए भी वह तात्त्विक न होने से उस जीव में सम्यक्त्व है ऐसा विश्वास ोता नहीं है । मिथायत्व मोहनीय का विगम (क्षयोपशम) के बिना तात्त्विक सद्दहणा प्रगट नहीं होती है।
3 लिंग -
1) शुश्रुषा, धर्म राग, देवगुरू की वैयावच्च - सेवा 1) सुश्रुषा - तात्त्विक बोध करानेवाले धर्म शास्त्र को बहुमान पूर्वक सुनने की इच्छा । रागादि भाव में वृद्धि करानेवाले गीत-नृत्यादि का त्याग करके धर्मश्रवण की प्रबल तृष्णा - इच्छा होना । 2) धर्म राग - शुश्रुषा गुण श्रुत धर्म के राग रूप है, यहां धर्म राग से चारित्रधर्म का राग होता है । जैसे - वन में भटकते हुए, भूखे प्रवासी को घेवरादि का जितना राग होता है उससे भी कई गुना अधिक चारित्र धर्म का राग होना चाहिए । 3) देव-गुरू की वैयावच्च-सेवा की प्रतिज्ञा- धर्मोपदेशक की गुरू तथा अरिहन्तदेव-जिनमंदिर आदि की सेवा-पूजा-भक्ति करने का नियम करना ।
10 विनय -
1) अरिहंत - (तीर्थंकर और सामान्य केवली), 2) सिद्ध, 3) जिनप्रतिमा (चैत्य), 4) श्रुत शास्त्र (द्वादशांगी) 5) धर्म (क्षमादि 10 यति धर्म) 6) साधु, 7) आचार्य 8) उपाध्याय 9) प्रवचन (जीवादि तत्त्व अथवा उसके आधारभूत श्रीसंघ), 10) दर्शन सम्यक्त्व और सम्यक्त्वी आत्मा आदि की भक्ति-पूजा प्रशंसा-निंदा त्याग और आशातना त्याग रूप विनय करना ।
भक्ति - आगंतुक के सामने जाना, आसनादि देना आदि बाह्य सेवा, पूजा- वस्त्रादि देना, प्रशंसा- गुण प्रशंसा - कीर्ति बढाना । आशातना त्याग - देव की 84, गुरू की 33, आशातना का त्याग ।
सम्यक्त्व की उपस्थिति में ही यह विनय आ सकता है अतः उसे सम्यदर्शन का विनय कहा जाता है ।
सम्यक् दर्शन I Samyak Darshan I Study of Spiritual Development (2021)
सम्यक् दर्शन I Samyak Darshan I Study of Spiritual Development (2021)


Session#1 I Study of Spiritual Development I Samyak Darshan I सम्यक् दर्शन I Date : Sep 18, 2021

Session#2 I Study of Spiritual Development I Samyak Darshan I सम्यक् दर्शन I Date : Sep 26, 2021

Session#3 I Study of Spiritual Development I Samyak Darshan I सम्यक् दर्शन I Date : Oct 2, 2021

Session#4 I Study of Spiritual Development I Samyak Darshan I सम्यक् दर्शन I Date : Oct 3, 2021

Session#5 I Study of Spiritual Development I Samyak Darshan I सम्यक् दर्शन I Date : Oct 10, 2021

Session#6 I Study of Spiritual Development I Samyak Darshan 67 points I Date : Oct 17, 2021

Session#7 I Study of Spiritual Development I Samyak Darshan 67 points I Date : Oct 24, 2021


