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Gandharwad Class
गणधरवाद क्या है?
२४ वे अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति होने पर वैशाख सुदि एकादशी को देवताओं ने अपापापुरी में समवसरण की रचना की तब सोमिल विप्र के यज्ञ - याग में समग्र देश भर के धुरंधर माने जाने वाले 11 ब्राह्मण विद्वान पंडित अपने हजारों शिष्य परिवार के साथ यज्ञ में आए थे। सर्वज्ञ की देशना की प्रसिद्धि और उद्घोषणा श्रवण कर प्रद्वेष एवं अहंकार भाव से प्रेरित होकर चर्चा- वाद - विवाद करके सर्वज्ञ बने महावीर को हरा कर वादविजेता बनकर अपनी यश कलगी में चार चांद लगाने की सोच से इन्द्रभूति पंडित आदि बारी - बारी से ११ ही पंडित समवसरण में सर्वज्ञ महावीर से चर्चा - वाद- विवाद करने अपने सैकड़ों - हजारों शिष्यों के साथ आते है। और काफी बड़ी गहन चर्चा - वाद - विवाद करते है। इस विषय का नाम है - ❝ गणधरवाद ❞
THE JAIN FOUNDATION IN ASSOCIATION WITH
SHRI MAHAVEER RESEARCH FOUNDATION, PUNE
गणधरवाद के अध्ययन का सुनहरा अवसर
ANNUAL COURSE OF COMPETITIVE JAIN PHILOSOPHY OF 'ATMA TO MOKSHA' BY पू. पं. डॉ. श्री अरुणविजयजी म. (DOUBLE M.A., PhD)
२४ वे तीर्थकर महावीर स्वामी भ. को केवलज्ञान की प्राप्ति होने पर वैशाख सुदि एकादशी को देवताओं ने अपावापुरी में समवसरण की रचना की तब सोमिल विप्र के यज्ञ याग मे समग्र देश भर के धुरंधर माने जाने वाले ११ ब्राह्मण विद्वान पंडित अपने हजारो शिष्य परिवार के साथ यज्ञ में आए थे। सर्वज्ञ की प्रसिद्धि और उद्घोषणा श्रवण कर प्रद्वेष एवं अहंकार भाव से प्रेरित होकर चर्चा वाद विवाद करने अपने सैकड़ो हजारो शिष्यों के साथ आते हैं ओर काफी बड़ी गहन चर्चा वाद विवाद करते है। इस विषय का नाम है - 'गणधरवाद' इसका विस्तृत विवरण विशेषाश्यक भाष्य तथा कल्पसूत्रदि आगम में हैं। आखिर हमें क्यों पढ़ना / सीखना चाहिए गणधरवाद ? क्या फायदा ? आत्मा है कि नहीं? क्या शरीर ही आत्मा है? क्या पुण्य पाप और स्वर्ग नरक, लोक परलोक, पूर्वजन्म पुनर्जन्म और मोक्षादि है कि नहीं? आज भी लाखों लोग आत्मा से मोक्ष तक के तत्वों को न मानने वाले नास्तिक तथा मिथ्यामति बने हुए हैं। इस गणधरवाद में इन सब विषयों की शंका का समाधान वीर प्रभु ने कैसा किया है यह सब PHILOSOPHICAL & LOGICAL ARGUMENTS के साथ अनेक प्रमाणों से, तर्क- युक्ति बुद्धिगम्य तरीके से समझने के लिए यह वार्षिक SERIES चालू की जा रही है। भक्तिसूरी समुदाय के गच्छाधिपती आ. श्री प्रेमसूरी म. के ज्येष्ठ भ्राता गुरुबंधु पू. आ. श्री सुबोधसूरी म. के शिष्यरत्न जैन श्रमण संघ के DOUBLE M. A. और PHD, सुप्रसिद्ध विद्वान, अनेक तात्विक पुस्तकों के लेखक एवं सचित्र शैली के प्रवचनकार वाचना शिक्षा प्रदाता पू. पं. डॉ. श्री अरुणविजयजी म. सा. नियमित सचित्र समझायेंगे सिखायेंगे ।










