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Gurudev
धर्मधुरंधर, ज्ञानोपासक, परम् उपकारी गुरुवर;
धर्म का मर्म प्रकाशित करते, समकित को करते निर्मल!
धीर-गंभीर, तेजस्वी, मेधावी, बहुभाषी, जिनागमवेत्ता;
श्यामपट्ट और आधुनिक तकनिकसे सिखाने की जिनकी है अनोखी कुशलता!
द्रव्यानुयोग, गणितानुयोग, धर्मकथानुयोग और चरण-करणानुयोग के माध्यम से;
सरलतासे कर्म-ग्रंथ, ग्रंथि-भेद, भेद-ज्ञान, ज्ञान-ध्यान, भक्तियोग से ज्ञानसरिता को अविरत बहाते!
गहराई से घूंट-घूंटकर हर विषय को सिखलाते, अनुशासनसे पूर्वपाठ की अनुप्रेक्षा भी करवाते;
और सटीक जवाब सुनानेपर, प्रथम पारितोषिक के तहत केन्या, अफ्रीका और पाकिस्तान को भी सौगात में दिलवाते!
ऐसे गुरुवर पंन्यास प्रवर श्री अरूणविजयजी म सा के चरणों में कोटिश: वंदन ।।।।।।
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Dr. Arunvijayji
On Karmavad
धर्म करने का उद्देश्य क्या है । पंचाचारमय श्रावक जीवन की दिनचर्या कैसी होनी चाहिए । गुणानुरूप क्रिया करने गुण प्रगट होंगे । गुणाचार ही आत्मधर्म है ।

Dr. Arunvijayji
On Granthibhed
Study of Jain Karma Philosophy and Cutting the Gordian knot of belief (जैन कर्म शास्त्र और ग्रंथि भेद )
What is the real form of SOUL❓ (आत्मा (SOUL) का वास्तविक स्वरूप क्या है ❓)