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18 Papasthan
પાપનો માર્ગ એ દુ:ખદાયી માર્ગ છે..શરૂઆતમાં ખૂબ જ મીઠો લાગે..પણ પરિણામ કેવું ભયંકર..પાપનો કાળ તો ક્ષણિક માત્રનો જ પણ સજા તો કેટકેટલા ભવ સુધીની.
કર્મસત્તાએ તો તીર્થંકર ભગવંતને પણ નથી છોડ્યા તો વિચારો આપણું શું થશે.

१८ पापस्थान
1.प्रणातिपात- किसी भी जीव की हिंसा करना ,उसका वध कर देना, उसे जान से मार देना यह सबसे बड़ा पाप है ।
2. मृषावाद- असत्य वचन बोलना ,हमेशा झूठ बोलना यह सबसे बड़ा पाप है ।
3. अदत्तादान- किसी से पूछे बिना उसकी वस्तु लेना, चोरी करना यह पाप है ।
4. मैथुन - असंयमित होकर कुशील का सेवन करना पाप है।
5. परिग्रह - किसी वस्तु को संचित करना, द्रव्य आदि रखना ममता रखना पाप है।
आप कहेंगे क्यों ?
क्योंकि जो वस्तु हमारी आत्मा में कलेश उत्पन्न करें और उसके मूल स्वरूप में परिवर्तन लाए जिससे आत्मा अपनी पहचान खो जाती है ,वह पाप है।
6.क्रोध - खुद तपना ,दूसरों को तड़पाना, अत्यधिक क्रोध करना पाप है क्रोध सभी प्रकार की हानियों की जड़ है और यह पाप का मूल है।
7. मान- अंहकार (घमंड करना) पाप है ।
8. माया- ठगाई करना, कपट पूर्वक आचरण करना ।
9. लोभ - तृष्णा बढ़ना,अत्यधिक पाने की लालसा करना ।
10.राग- मनोज्ञ वस्तु पर स्नेह रखना, प्रीति करना ।
11.द्वेष- अमनोज्ञ वस्तु पर द्वेष करना ।
12. कलह - क्लेश करना ।
13. अभ्याख्यान - किसी पर झूठा कलंक लगाना ।
14. पैशुन्य- दूसरों की चुगली करना ।
15. परपरिवाद- दूसरों का अवर्णवाद (निन्दा) बोलना ।
16.रति अरति- पांच इंद्रियों के 23 विषयों में से मनोज्ञ वस्तु पर प्रसन्न होना, अमनोज्ञ वस्तु पर नाराज होना ।
17.मायामृषावाद- कपट सहित झूठ बोलना ।
18.मिथ्यादर्शन - असाधु को साधु समझना, कुदेव, कुगुरु कुधर्म पर श्रद्धा रखना ।
इस प्रकार उपरोक्त वर्णित 18 पापों को छोड़ देने से ही जीव की मुक्ति संभव होती है । इसलिए प्रत्येक जैन मुनि और जैन श्रावक छोटे से छोटे जीव की हिंसा के बारे में भी विचार करता है।